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डॉ. विजयपत सिंघानिया ने अनेक शानदार उपलब्धियां हासिल की हैं । उन्होने हमारे सामने साहस और उत्कृष्टता के नये कीर्तिमान बनाकर हमें अनेक बार प्रेरित किया है ।
दुनिया उन्हें केवल औद्योगिक उपलब्धियों के लिए ही नही वरन् एक कुशल विमान चालक के रुप में भी जानती है। विमान चालक के रुप में उन्होंने अदम्य साहस व शौर्य का परिचय देते हुए अनेकों जोखिम भरे हैरत अंगेज करनामों को अंजाम दिया और कई कीर्तिमान स्थापित किए। इन सब कार्यों से अलग उन्होंने अपनी पहचान समाज सेवी कार्यों में भी बना रखी है ।
समाजकल्याण एवं ग्रामीण विकास के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु उन्होंने पशुधन विकास की ओर विशेष योगदान दिया है। उन्होंने पशु नस्ल-सुधार कार्यक्रम के तहत् कृत्रिम गर्भाधान एवं भ्रूण अंतरण के विकास व प्रचार को प्रोत्साहित किया है ।
डॉ. विजयपत सिंघानिया जी का दृढ विश्वास है कि शिक्षा व खेलों के माध्यम से सदृढ भारत का निर्माण संभव है। इन्ही भावनाओं से प्रेरित होकर उन्होंने श्रीमती सुलोचना देवी सिंघानिया स्कूल, थाने; कैलाशपथ सिंघानिया हाईस्कूल, हिंदवाडा एवं जे. के. स्पोर्टस संस्थान को स्थापित किया है ।
वे भारतीय प्रंबधन संस्थान, अहमदाबाद के प्रशासक मन्डल के सदस्स तथा जमनालाल बजाज प्रबंध अध्ययन संस्थान, मुम्बई के विजिटिंग प्राध्यापक भी रह चुके हैं ।
अपनी व्यस्तता के बावजुद वे स्क्वैश, तैराकी, स्नूकर, बिलियडर्स और गोल्फ जैसे अपने मन पसंद खेलों तथा फोटोग्राफी और बागबानी जैसी रूचियों के लिऐ वक्त निकाल लेते हैं ।
उन्होंने अगस्त / सितंबर १९८८ में यू.के.से भारत तक माइक्रोलाइट विमान में अकेले उड़ान भरके अविश्वसनीय कीर्तिमान स्थापित किया । उनका यह कारनामा गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस में दर्ज किया गया ।
उन्होंने १९९४ में मॉन्ट्रियल (कनाडा) से प्रारंभ और वहीं खत्म हुई प्रथम अंतरराष्ट्रीय हवाई दौड में २४ दिन के महासमर में कई देशों के ऊपर से गुजरते हुए ३४,००० किलोमीटर की दुरी तय करके इसे जीतने का गौरव भी हासिल किया है । इस विजय की बर्दोलत उन्हें एक दूसरा सम्मान भी प्राप्त हूआ - यह था एफ ए आई (फेडरेशन एयरोनॉटिक इंटरनेशनेल) स्वर्ण पदक - जो कि उड्डयन खेलों में दिया जाने वाला अत्यंत प्रतिष्ठित सम्मान है । उड्डयन के क्षेत्र में एफ ए आई को ओलंपिक के स्वर्णपदक का दर्जा हासिल है । भारत के पूर्व राष्ट्रपति महामहिम श्री. आर. वेंकटरमन ने उन्हे भारतीय वायुसेना के मानद एयर कमॉडोर की उपाधी से अलंकृत किया । भा.वा.से. के ग्वालियर स्थित ७ वे एयर स्क्वाड्रन जिसमे एयरक्राप्ट मिराज २००० शामिल है, ने उन्हे अपने पहले और एकमात्र सिविलियन सदस्य के रुप मे स्कवाड्रन 'द बैटल ऐक्सस' मे शामिल करके सम्मानित किया है ।
उड्डयन के क्षेत्र मे उनकी अब तक की उपलब्धियों (लाइफ टाइम अचीवमेंट) को दृष्टिगत करते हुए भारत सरकारने वर्ष २००१ हेतु, उन्हे 'तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय ए़डवेन्चर अवार्ड' से सन्मानित किया है ।
उड्डयन के क्षेत्र मे विशिष्ट, उपलब्धियों हेतु, डॉ. विजयपत सिंघानिया को भारतीय रेल की १५० वी जयंती और विमानन की शताब्दी के अवसर पर 'छत्रपति शिवाजी महाराज स्मारक अवार्ड' से सम्मानित कि गया । प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान संस्थान, लंदन व्दारा अक्तूबर, २००३ में उन्हें पी.एच.डी. की मानद उपाधि प्रदान की गयी ।
पदकों और सन्मानों प्रेरित होकर डॉ. सिंघानिया ने गर्म हवा के गुब्बारे में बैठकर ६४,९९७ फीट की ऊंचाई को छुने के उस विश्व कीर्तिमान को ध्वस्त करने का निश्चय किया, जो पीटर लिण्डस्ट्रैण्ड द्वारा स्थापित किया गया था और जिसे गत १७ सालों से कोई तोड नहीं सका था ।
अन्तत २६ नवम्बर, २००५ को डॉ. सिंघानिया ने ६९,८५२ फीट की उंचाई पर पहुचकर पूर्व रिकॉर्ड को लगभग ५,००० फीट के अन्तर से तोडते हुए नया विश्व रिकॉर्ड कायम किया ।
६७ साल की उम्र में उन्होंने वह कर दिखाया जिसे करने के लिए हममें से कुछ लोग केवल सपना ही देखते है। इस तरह उन्होंने इस क्षेत्र में लोगों के लिए नए आश्रम स्थापित किए। |