इस योजना का प्रमुख उद्देश स्थानिय अवर्णित कम दुधारु देशी गाय-भैसों में वर्णित अधिक अनुवांशकीय क्षमतायुक्त देशी/विदेशी नस्ल के सांडो के हिमीकृत वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान तकनीक के व्दारा उन्नत/संकर नस्ल के पशु उत्पन्न करना है ।
इस तरह उत्पन्न अधिक क्षमता युक्त अनुवंशी/संकर पशुुओं में देशी दुधारु पशुओ की तुलना मे अधिक दूध देनी की क्षमता होती है ।
यह उपलब्धी 'पशु नस्ल सुधार' कार्यक्रम की एक नवीन अवधारणा के तहत 'एकीकृत पशुधन विकास केंद्र' के माध्यम से प्राप्त की जाती है।
प्रत्येक एकीकृत पशुधन विकास केंद्र अपने समीपस्थ ८-१० गांव, जिनकी दूरी केंद्र से ५-८ किमी तक होती है; में अपनी सेवामें प्रदान करते है । केंद्रो की संस्था विकासखण्ड के उपलब्ध क्षेत्रफल एवं प्रजनन योग्य पशुओं की संस्था पर निर्भर करती है ।
प्रत्येक केंद्र में एक योजना परिचालक जिसे 'गोपाल' कहा जाता है, की नियुक्ति की जाती है । सभी गोपालों को रेमण्ड भूण विकास केंद्र, गोपालनगर मे विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों के व्दारा छ: माह का व्यापक प्रशिक्षण दिया जाता है; जिससे वे गाय-भैसों में कृत्रिम गर्भाधान एवं अन्य पशुपालन संबंधी सेवाए सुचारु रुप से गांवो में प्रदान कर सके ।
योजना परिचालक को मोटरसाइकल प्रदान की जाती है, ताकि वह किसानों कोे उनके घर पर कृत्रिम गर्भाधान और पशुचिकित्सा संबंधी सेवाएं प्रदान करे ।
इस योजना की सफलता की सुदृढ करने के लिए सभी गांवो मे बधियाकरण शिबिरों का आयोजन व्यापक रुप से किया जाता है जिनमें देशी एवं अपरिष्कृत सांडों की नसबंदी, बधियाकरण यंत्र के व्दारा की जाती है। इस हेतू ग्राम सरपंच एवं पशुपालकों की सहमति, बैठको के व्दारा ली जाती है ।
इन केन्द्रो के योजना परिचालकों (गोपालों) के कार्यों के पर्यवेक्षण और देख-रेख हेतु सुयोग्य पशु-चिकित्सकों की नियुक्ति की जाती है । औसतन एक पशु-चिकित्सक १० एकीकृत पशुधन विकास केन्द्रो का पर्यवेक्षण करता है ।
इन केन्द्रो के माध्यम से विभिन्न गांवों के किसानों के साथ नियमित रुप से बैठक की जाती है, ताकि उन्हें कृत्रिम गर्भाधान और उन्नत नस्ल की उपयोगिता समझायी जा सके ।
पशु नस्ल सुधार योजना को रोज़गार सृजन, गरीबी उन्मुलन और कुपोषण की रोकथाम के परिपेक्ष्य में देखें तो इसका प्रभाव स्पष्ट दिखता है, सरकारी निकाय यथा जिला पंचायतें अधिकाधिक रुप में इसमें काफी दिलचस्पी ले रही हैं ।
यह ट्रस्ट, चार राज्यों छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तरांचल एवं आंध्र प्रदेश के २२ जिलों में ५५३ एकीकृत पशुधन विकास केन्द्रो का संचालन कर रही है ।
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